बंटवारे के जख्म आज भी ताजा, पीड़ितों को याद करना इंसानियत का फर्ज़: LG सिन्हा

Friday, Aug 14, 2026-03:40 PM (IST)

जम्मू-कश्मीर ( मीर आफताब ) :   जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने शुक्रवार को कहा कि 1947 के बंटवारे से मिले घाव लगभग आठ दशक बाद भी पूरी तरह नहीं भरे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश के बंटवारे के दौरान पीड़ित हुए और जान गंवाने वाले लोगों को याद करना "इंसानियत के प्रति फर्ज़" है। 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' (Partition Horrors Remembrance Day) के मौके पर श्रीनगर के टैगोर हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए LG सिन्हा ने कहा कि यह दिन सिर्फ इतिहास के एक दर्दनाक अध्याय को याद करने का नहीं, बल्कि आत्म-मंथन, राष्ट्रीय संकल्प और यह सुनिश्चित करने का भी है कि अतीत की त्रासदियां कभी न दोहराई जाएं।

सिन्हा ने बंटवारे के दौरान भारी पीड़ा सहने और जान गंवाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा, "आज हम सब यहां एक समुदाय, एक राष्ट्र, एक परिवार और एक सामूहिक चेतना के रूप में इकट्ठा हुए हैं।" उन्होंने कहा कि बंटवारे के दौरान पीड़ित लोगों का बलिदान देश को याद दिलाता रहता है कि देश के बंटवारे से हुए घाव अभी पूरी तरह नहीं भरे हैं।

उन्होंने कहा, "बंटवारे के आठ दशक बाद भी यह घाव पूरी तरह नहीं भरा है। आज भी भारत की सामूहिक चेतना में एक ऐसा दर्द है जो पीढ़ियों के बीतने के बाद भी मिटा नहीं है।" 'पीड़ितों को याद करना इंसानियत के प्रति फर्ज है'

LG ने कहा कि 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' उन लोगों को याद करने का मौका होना चाहिए जिनकी आवाजें 1947 की हिंसा और विस्थापन के बीच खो गई थीं। उन्होंने कहा, "हम उनके दर्द को इतिहास की धूल में दफन नहीं होने देंगे। उन्हें याद करना इंसानियत के प्रति फर्ज होगा।"

उन्होंने कहा कि पीड़ित लोगों की यादों को ईमानदारी, सच्चाई और करुणा के साथ संजोकर रखा जाना चाहिए, इसे उन्होंने उन्हें दी जा सकने वाली "सबसे पवित्र श्रद्धांजलि" बताया।

सिन्हा ने 14 अगस्त को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के रूप में मनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी आभार व्यक्त किया और कहा कि यह मौका सामूहिक राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बना रहना चाहिए।

उन्होंने लोगों से इस दिन को सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना से कहीं ज्यादा के तौर पर याद करने का आह्वान किया और कहा कि यह आत्म-मंथन और राष्ट्रीय संकल्प का मौका होना चाहिए। उन्होंने कहा, “यह दिन इतिहास का सिर्फ एक पन्ना नहीं है। यह आत्म-मंथन, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय संकल्प का दिन भी है।”

‘नई पीढ़ी को बंटवारे की मानवीय कीमत पता होनी चाहिए’

सिन्हा ने इस बात पर जोर दिया कि युवा पीढ़ी को बंटवारे की मानवीय कीमत समझनी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश का बंटवारा सिर्फ भौगोलिक सीमाओं में बदलाव नहीं था, बल्कि इसने परिवारों को बहुत दुख पहुंचाया, समुदायों को बर्बाद किया और ऐसी पीड़ा दी जिसकी यादें आज भी बचे हुए लोगों और उनकी आने वाली पीढ़ियों के मन में जिंदा हैं।

उन्होंने कहा, “अनगिनत लोगों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। अनगिनत जिंदगियां अंधेरे में खो गईं।”

LG ने कहा कि समाज को उन लोगों की कहानियों को संजोकर रखना चाहिए जिन्हें उनके घरों से उखाड़ दिया गया और अनजान जगहों पर अपनी जिंदगी फिर से शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

उन्होंने कहा, “समाज के हर वर्ग के लिए यह जानना जरूरी है कि बंटवारे के दौरान पाकिस्तान से आने वाली ट्रेनें लाशों से भरी होती थीं। बच्चों, महिलाओं, पुरुषों और बेटियों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।”

*जिन्होंने सब कुछ खो दिया, उन्होंने अपनी जिंदगी फिर से बनाई’

सिन्हा ने कहा कि बंटवारे की कहानी सिर्फ दुख की नहीं, बल्कि हिम्मत, मजबूती और पुनर्निर्माण की भी है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने सब कुछ खो दिया था, उन्होंने अपनी जिंदगी फिर से बनाने के लिए अद्भुत हिम्मत, कड़ी मेहनत और आत्मविश्वास दिखाया।

उन्होंने कहा, “जिन्होंने सब कुछ खो दिया था, उन्होंने अपनी हिम्मत, कड़ी मेहनत और आत्मविश्वास से अपनी जिंदगी फिर से बनाई।” उन्होंने आगे कहा कि कई विस्थापित परिवारों ने अपनी लगन से उन जगहों को बदल दिया जहां वे बसे थे।

उन्होंने कहा कि शरणार्थी परिवार अपने साथ अपनी भाषाएं, सांस्कृतिक परंपराएं और मूल्य लेकर आए, जिससे उन इलाकों का सांस्कृतिक ताना-बाना समृद्ध हुआ जहां वे बसे।

उन्होंने कहा, “उनका संघर्ष हमें यह भरोसा दिलाता है कि हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, इंसानी हिम्मत हर तरह के अंधेरे पर जीत हासिल कर सकती है।”

‘बंटवारे का J&K पर गहरा असर पड़ा’

खास तौर पर जम्मू-कश्मीर का जिक्र करते हुए सिन्हा ने कहा कि बंटवारे का इस इलाके पर गहरा असर पड़ा, जिससे परिवार बंट गए और समुदाय अपने पुश्तैनी घरों से विस्थापित हो गए।

उन्होंने कहा कि उपमहाद्वीप के अलग-अलग हिस्सों से विस्थापित होकर जम्मू-कश्मीर आए लोगों ने इलाके के सामाजिक और सांस्कृतिक माहौल में अहम योगदान दिया।

उन्होंने कहा, “बंटवारे ने परिवारों को बांट दिया और कई समुदायों को उनके अपने घरों से विस्थापित होना पड़ा।”

सिन्हा ने उन लोगों को श्रद्धांजलि दी जिन्होंने तमाम मुश्किलों के बावजूद जम्मू-कश्मीर में अपनी जिंदगी फिर से बनाई। उन्होंने J&K कल्चरल डिपार्टमेंट की भी तारीफ की, जिसने ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जिनका मकसद यह पक्का करना था कि बंटवारे की यादें और उससे मिली सीख समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंचे।

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Content Editor

Neetu Bala

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