LPG संकट ने बदली रसोई की कहानी, गांववालों ने अपनाई पुरानी परंपरा

Monday, May 04, 2026-01:39 PM (IST)

साम्बा(संजीव): वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव और युद्ध जैसे हालातों का असर अब सीधे आम लोगों की रसोई तक पहुंचने लगा है। अमेरिका, इजरायल व ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष के चलते तेल और गैस की कीमतों में लगातार बढ़ौतरी हो रही है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव ग्रामीण इलाकों में देखने को मिल रहा है, जहां लोग अब एक बार फिर पारंपरिक मिट्टी के चूल्हों की ओर लौट रहे हैं।

गैस सिलेंडर की ऊंची कीमतों और समय पर आपूर्ति न होने से परेशान ग्रामीण अब सस्ते और सहज विकल्प तलाश रहे हैं। विजयपुर के गांव कमाला में यह बदलाव साफ नजर आता है, जहां कुम्हार अपने हाथों से मिट्टी के चूल्हे बनाकर नई उम्मीदें संजो रहे हैं। स्थानीय कुम्हार रमेश लाल बताते हैं कि कुछ समय पहले तक इन चूल्हों की मांग लगभग खत्म हो चुकी थी, लेकिन अब रोजाना ऑर्डर मिल रहे हैं, साथ ही मिट्टी के मटकों की बिक्री में भी तेजी आई है।

ईंधन के लिए गांवों की ओर रुख

स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि गैस बुकिंग के कई दिन बाद भी उपभोक्ताओं को सिलेंडर नहीं मिल पा रहा। ऐसे में अब गांवों के लोग चूल्हों की ओर रुख कर रहे हैं। कंडे (गोबर के उप्पले) और सूखी लकड़ी की मांग अचानक बढ़ गई है, जिससे इनकी कीमतों में भी उछाल आया है। कई ग्रामीण महिलाएं सुबह-सुबह टोकरी लेकर गोबर इकट्ठा करती नजर आ रही हैं, जबकि पुरुष नदी, तालाब और नर्सरी के आसपास से सूखी लकड़ियां जुटा रहे हैं। उनका कहना है कि महंगी गैस और लंबा इंतजार करने से बेहतर है खुद ईंधन की व्यवस्था करना।

पशुपालन को मिला बढ़ावा

इस बदलते परिदृश्य का असर पशुपालन पर भी पड़ा है। गोबर की बढ़ती मांग के कारण किसान अब अपने मवेशियों को खुले में छोड़ने के बजाय उनकी देखभाल पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। इससे सड़कों पर आवारा पशुओं की संख्या में भी कमी आई है।

उज्ज्वला योजना को चुनौती

साल 2016 में शुरू हुई उज्ज्वला योजना ने ग्रामीण महिलाओं को चूल्हे के धुएं से राहत दी थी, लेकिन मौजूदा हालातों ने इस व्यवस्था को चुनौती दे दी है। कई घरों में अब फिर से ईंटों के अस्थायी चूल्हे बनाए जा रहे हैं और पारंपरिक तरीकों से खाना पकाया जा रहा है।

इतिहास दोहराने को मजबूर हालात

ग्रामीणों का कहना है कि लकड़ी और कंडों की आंच पर बना खाना स्वाद में बेहतर होता है। कुछ लोग हल्के अंदाज में कहते हैं कि "गैस के खाने से गैस (एसिडिटी) होती थी, अब पुराना तरीका ही सही है।" स्पष्ट है कि युद्ध और महंगाई के इस दौर ने आधुनिक जीवनशैली को झटका दिया है और लोगों को एक बार फिर अपनी जड़ों की ओर लौटने पर मजबूर कर दिया है। मिट्टी के चूल्हे, जो कभी पिछड़ेपन की निशानी माने जाते थे, आज जरूरत और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गए हैं।

अपने शहर की खबरें Whatsapp पर पढ़ने के लिए Click Here

जम्मू-कश्मीर की खबरें Instagram पर पढ़ने के लिए हमें Join करें Click Here


Content Writer

Sunita sarangal

सबसे ज्यादा पढ़े गए

Related News